जीवन को सफल बनाने के लिए दूसरों को सुख देना चाहिए। परंतु इससे पहले आपको स्वयं सुखी होना आवश्यक है।

जो मिठाई वाला है, वह दूसरों को मिठाई दे सकता है। जो कपड़े का व्यापारी है, वह दूसरों को कपड़ा दे सकता है। लकड़ी का व्यापारी लकड़ी दे सकता है। और लोहे का व्यापारी लोहा दे सकता है। इन सब प्रत्यक्ष उदाहरणों से यही पता चलता है, कि जिस व्यक्ति के पास जो वस्तु है, वह व्यक्ति दूसरों को वही वस्तु दे सकता है।

*इसी प्रकार से जो स्वयं सुखी है, वही दूसरों को सुख दे सकता है। और जो व्यक्ति स्वयं दुखी है, वह तो दूसरों को दुख ही देगा। उसके पास सुख है ही नहीं, तो कैसे देगा?*

अब शास्त्र यह कहते हैं, *यदि आप अपने जीवन को सुखी और सफल बनाना चाहते हैं, तो आपको दूसरों को सुख देना होगा।*

जो लोग सुखी हैं, वे दूसरों को सुख देते हैं। जो लोग दुखी हैं, वे दूसरों को दुख देते हैं। जिसके पास जो होगा, वह वही तो देगा! तो पहले आप स्वयं सुखी बनें, फिर दूसरों को भी सुख देवें। तभी आपका जीवन सफल माना जाएगा।

अब प्रश्न यह है, कि “आप स्वयं कैसे सुखी होंगे?” इस प्रश्न का उत्तर है — कि सबसे पहले ईमानदारी सीखनी होगी। ईमानदारी का अर्थ है, छल कपट से रहित होकर, सरलता से व्यवहार करना। मन वाणी और शरीर के व्यवहारों को एक रूप बनाना। और यह एकरूपता ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल होनी चाहिए, अर्थात् सुखदायक होनी चाहिए, दुखदायक नहीं।

इसके अतिरिक्त सुखी होने के लिए व्यक्ति को सभी क्षेत्रों में सत्य का पालन करना चाहिए। मन इंद्रियों पर संयम रखना चाहिए। मन में परोपकार की इच्छा रखनी चाहिए, और व्यवहार में भी यथाशक्ति दूसरों की सहायता करनी चाहिए। ऐसी ईमानदारी सच्चाई आदि गुणों से युक्त हो कर व्यक्ति यदि व्यवहार करे, तब तो ईश्वर उसे सुख देगा। फिर वह स्वयं सुखी होकर दूसरों को भी सुख दे पाएगा। ऐसा करने से उसका यह जन्म और अगला, दोनों जन्म सुखमय होंगे।

अब दुख से बचने के लिए, झूठ छल कपट धोखा चालाकी अन्याय शोषण आदि बुरे कर्मों से प्रत्येक व्यक्ति को बचना चाहिए। क्योंकि इन सब कामों को करने से, ईश्वर की न्याय व्यवस्था से, व्यक्ति स्वयं चिंतित परेशान एवं दुखी रहता है। *यदि वह इन सब बुरे कर्मों को करेगा, तो स्वयं दुखी होगा। फिर वह अपना जीवन तो नष्ट करेगा ही, साथ में दूसरों को भी दुख ही देगा। ऐसा करने से उसका यह जन्म और अगला, दोनों जन्म बिगड़ जाएंगे। इसलिए बुरे कर्मों से बचें, उत्तम कर्म करके स्वयं सुखी रहें, तथा दूसरों को भी सुख देवें। इसी में मानव जीवन की सफलता है ओ३म्  स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी

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