ओ३म

Arya Pratinidhi Sabha Of Queensland Inc

सबके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना

यदि आप चाहते हैं, कि लोग आपके प्रति प्रेम श्रद्धा विश्वास और सम्मान की भावना रखें, आपको सुख देवें, तो आपको सबके साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना होगा।*

यह संसार ईश्वर ने बनाया है। वह सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् है। ईश्वर ही इस संसार का सबसे बड़ा राजा है। इसलिए संसार में उसी का शासन सर्वोपरि है।

आप और हम, ईश्वर के द्वारा बनाए गए संसार में रहते हैं। वह हमारा राजा है, और हम उसकी प्रजा हैं। उस राजा का संविधान हम सब पर लागू होता है। यदि प्रजा, राजा के संविधान का पालन करती है, तो उसे राज्य व्यवस्था से सुख मिलता है। यदि प्रजा, राजा के संविधान का पालन नहीं करती, तो राज्य व्यवस्था से प्रजा को दुख मिलता है।

मनुष्य की राज्य व्यवस्था में तो कमियां होती रहती हैं, क्योंकि मनुष्य सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् नहीं है। वह सब ओर देख नहीं पाता। व्यवस्था नहीं कर पाता। परंतु ईश्वर के साथ यह समस्या नहीं है। वह तो सर्वज्ञ तथा सर्वशक्तिमान् है। वह सदा सावधान रहता है। कभी लापरवाही नहीं करता। कभी किसी पर अन्याय नहीं करता। कभी किसी को कोई रियायत अर्थात् न्याय व्यवस्था में कोई छूटछाट नहीं करता। उसके नियम सबसे उत्तम एवं पूर्ण हैं। इन कारणों से यदि हमें और आपको ईश्वर के राज्य में सुख पूर्वक रहना है, तो यह अनिवार्य है कि हमें और आपको ईश्वर का संविधान जानना समझना ही पड़ेगा। उसे ठीक प्रकार से जान समझकर, उस का पालन करना पड़ेगा। यदि हम और आप ऐसा नहीं करेंगे, तो निश्चित रूप से ईश्वरीय न्याय व्यवस्था के अंतर्गत हमें और आपको दंड भोगना होगा। और इसके दोषी हम और आप ही होंगे, कोई दूसरा नहीं।

संसार भर के देशों की सरकारों ने भी बहुत से कानून ईश्वर के संविधान के आधार पर ही बनाए हैं, क्योंकि वे सुखदायक हैं। जैसे न्याय पूर्ण व्यवहार करना, सत्य बोलना, दूसरों की सहायता करना आदि।

इसलिए जितना जितना संसार के लोग ईश्वरीय संविधान का पालन करते हैं, उतनी उतनी मात्रा में वे सब लोग सुखी हैं। और जितनी मात्रा में वे ईश्वरीय संविधान का उल्लंघन (चोरी डकैती झूठ व्यभिचार आदि) दुखदायक कर्म करते हैं, उतनी मात्रा में वे सब दुखी हैं।

इसी श्रृंखला में यह निवेदन है कि यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोग आपके साथ अच्छा व्यवहार करें, आपके प्रति प्रेम और सद्भावना रखें, आप पर विश्वास करें, तो इस इच्छा की पूर्ति के लिए आपको भी, ईश्वरीय संविधान के अनुसार, सब के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करना होगा। अन्याय पूर्ण व्यवहार छोड़ना होगा। यह आप कब कर पाएंगे? जब आपके विचार संस्कार चिंतन आदि शुद्ध हो, उत्तम हो। तभी आपकी यह इच्छा पूरी हो पाएगी। इसलिए अपने विचार संस्कार एवं चिंतन को ईश्वरीय संविधान के अनुसार शुद्ध करें ओ३म् ।*स्वामी विवेकानंद परिव्राजक*

ईश्वर तो सब जगह है

अपने पूजा स्थलों आदि स्थानों पर तो ईश्वर है, परंतु क्या घर खेत दुकान कार्यालय आदि में नहीं।” लोगों का चिंतन बड़ा विचित्र है।*

एक व्यक्ति ने मंदिर में दूसरे व्यक्ति से कहा – *देखो, सच सच बताना, झूठ नहीं बोलना। तुम भगवान के घर में बैठे हो। यहाँ झूठ नहीं बोलना चाहिए।*

जो व्यक्ति मंदिर में ऐसा कह रहा था, वही व्यक्ति जब अपनी दुकान पर जाता है, कहीं कार्यालय में काम करता है, अथवा कोई और व्यवसाय करता है; तो मंदिर आदि स्थानों से बाहर, दुकान आदि अन्य स्थानों पर वही व्यक्ति स्वयं झूठ बोलता है। और यह सोचता है कि *”यहां तो भगवान नहीं देखता। यहाँ तो वह हमारा झूठ नहीं पकड़ेगा। हमें कोई दंड नहीं देगा।”* इसलिए वह वहां पर झूठ बोलता है, छल कपट चालाकी धोखाधड़ी आदि सब प्रकार के पाप कर्म करता है। और वहाँ दुकान आदि स्थानों पर, दूसरों को भी कुछ नहीं कहता कि *”देखो यहां भगवान है। यदि तुम झूठ बोलोगे, तो वह तुम्हें दंड देगा।”*

आप देख लीजिये, लोगों का चिंतन कितना विचित्र है। अपने अपने पूजा स्थलों पर तो व्यक्ति यह सोचता है कि वहां ईश्वर भगवान है। वहां उससे डरता है, और गलत काम करने से बचने की कोशिश करता है। परंतु दुकान में कार्यालय में या अन्य स्थानों पर वह सोचता है कि *यहां कोई ईश्वर भगवान नहीं है। यहां हमें कोई नहीं देखता। यहां जो मर्जी पाप कर लो, कोई दंड नहीं देगा।*

अब आप निष्पक्ष भाव से सोचिए, *क्या ईश्वर केवल मंदिर मस्जिद चर्च आदि में ही रहता है या अन्य स्थानों पर भी?*

जब लोगों की आपस में बातचीत चलती है, तब तो लोग यही कहते हैं, कि * ईश्वर भगवान एक है। वह सब जगह रहता है।* परंतु जब व्यवहार की बात आती है, *तो लोग झूठ छल कपट चोरी बेईमानी आदि पाप कर्म करते समय सब भूल जाते हैं कि ईश्वर भगवान सब जगह है और हमें देखता भी है। हमें वह दंड भी देगा। यह दंड ही तो समझ में नहीं आता, इसलिए लोग पाप करते हैं। जिस जिस व्यक्ति को दंड समझ में आ जाता है, वह व्यक्ति फिर पाप कर्म नहीं करता। जैसे चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस की टीम को देख कर लोग लालबत्ती पार नहीं करते।*

आप भी ठंडे दिमाग से सोचिए, *यदि ईश्वर सब जगह है और वह सबके अपराधों को देखता है, उनका दंड भी देगा। तो इसका अर्थ यह हुआ कि लोग ईश्वर को सब जगह स्वीकार न करते हुए, अपने आप को धोखा दे रहे हैं।*

इसलिए *भाइयो ! स्वयं को धोखा मत दो। अविद्या की नींद से जागो। अपराध करने से बचो। ईश्वर से डरो, वह बड़ा जबरदस्त है। किसी को भी नहीं छोड़ेगा। जो भी पाप करेगा, उसी को दंड देगा। वहां कोई पक्षपात अन्याय रिश्वतखोरी सिफारिश रियायत या रिश्तेदारी नहीं चलती है। पापियों को अगले जन्म में, पशु पक्षी जानवर वृक्ष वनस्पति समुद्री जीव आदि बना ही देगा, यह ईश्वर का न्याय (दंड)  है  ओ३म् ।- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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